शिवशंकर भोलेनाथ भी रोने लगे…

चार वर्षो से कल्याणी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार था “भावेष” !
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विगत चार सालो मे भावेष और कल्याणी के बिच प्यार इस कदर बड़ चुका था की एक दुसरे को पाने के लिए दोनो ने अपने परिवार से आये दिन झगड़े शुरु कर दिये थे..!
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विरोधी दल हर आठ दिन मे भावेष पर हमले करवाने लगा!
भावेष भी मन ही मन ठान चुका था की मुझे तो सिर्फ कल्याणी चाहिये और उसके लिए अगर मौत भी आ जाये तो गम नही.!
लेकिन कल्याणी के घर वालो की साजिश कामयाब रही और दोनो के बिच का संपर्क टुटा तो भारी विरह उत्पन्न हुआ!
एक साल बित गया, कल्याणी के बिछोह मे “भावेष” पागल सरिखा हो चला..!
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रात-दिन आंसुओ की बारिश, और कुछ नही खाने पीने की जिद ने भावेष को जीते- जी नरकंकाल बना दिया था!
इस अवसाद से बाहर निकलने के प्रयास मे भावेष ने सभी देवी देवता पुज डाले..!
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अपने इष्ट शंकर भगवान से याचना मे रोज प्रतिदिन कहता की है सदाशिव, मेरी किस्मत मे अगर कल्याणी नही है तो कोई बात नही, लेकिन है अविनाशी कम से कम मुझ अभागे पर इतनी दया तो कर दे की मै कल्याणी की यादो के चक्रव्युह से हमेशा के लिए खुद को बाहर निकल सकु!

« जब शंकर जी नही सुनते तो अगले ही दिन फिर याचना करता की अगर आप इतना भी नही कर सकते हो तो है महाम्रत्युंज, है महादेव, है सर्वेश्वर, है भोलेनाथ, कम से कम मुझे इस वियोग से ,इस अवसाद से तो बाहर निकाल दे शंभुनाथ, यह व्याकुलता और अकुलाहट मुझे ना मरने देती और ना ही ठिक से जीने देती है..!

« अगरबत्ति, नरियल, दुध, धतुरा, चड़ाकर श्रद्धा से मिन्नते करता लेकिन जब पुरी न होती तो अंत मै भावेष शंकर भगवान की लिंग पर मत्था ठोक मौत भी मांग लिया करता….! और जब मौत भी ना मिलती तो कम से कम मन की शांति प्रदान करो भगवन कह देता और बेबस, लाचार, नामोष, और असहाय होकर आंखो मे आंसु की बुंदे लिये वापस अपने घर लौट जाता..!
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अग्यानता के अभाव मे भावेष यह नही जानता था की वह शंकर जी से वह चिज मांग रहा है, जो शंकर जी के पास है ही नही! शंकर भगवान तो खुद इन विपदाओ को झेल चुके है जिनसे खुद शंकर भगवान के लिए असंभव रहा तो फिर ऐसे मे शंकर भगवान भावेष को क्या वर देते..?
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जो शंकर भगवान खुद राजा दक्ष की पुत्री और अपनी पत्नी सती की म्रत्यु उपरांत, मोहपाश मे बंधकर खुद आसक्ति और विलाप जैसी विपदा से नही बच सके तो भावेष कैसे उम्मीद कर सकता था..!
शंकर जी ने हजारो वर्ष तक अपनी पत्नी सती की लाश को कंधे पर उठाये रेगिस्तान के चक्कर लगाये..!
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गर्म रेत की तपन मे शरीर से फिसलते पसीने से तरबतर थे, उनकी जटाये बिखरकर आखो से लटकती हुई चेहरे को ढक चुकी थी, और आंखो से आंसुओ तीव्र धाराओ मे जटाये गीली होकर रेगिस्तान की गर्म रेत मे लतपथ हो चुकी थी..!
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शंकर भगवान दिन-रात रोने लगे और जीवो को मारने का जो काम शंकर भगवान को मिला है, वह संहार चक्र रुक गया, इसीलिए फिर श्रष्टी चक्र को अनावरत रखने हेतु अंत मे विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से शंकर जी की पत्नी सती की लाश के इक्कावन टुकड़े किये थे..!
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“भावेष” जब चारो तरफ से असहाय हो चुका था तब, उसे जीने की राह मिली,,, इस पुस्तक ने भावेष का जीवन बदलकर रख दिया, उसे विवेक प्रदान हुआ..!
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भावेष को अब पता चल चुका था की कल्याणी से प्यार “प्यार” नही मोह था,एक अासक्ति थी, जो बदले मे सिर्फ विरह और विलाप ही दे सकती थी..!
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आखिर भावेष को एक पुर्ण संत की शरण मे जाकर सतभक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ!
इसी पुस्तक “जीने_की_राह ने भावेष को पुर्ण भगवान, पुर्ण सदगुरु के सानिध्य मे लाकर पटक दिया जिसके आगे, मोह, द्वेष, क्रोध, लोभ, वासना, और आसक्ति जैसे दुर्गुण नही टीक पाते! कौन है वह पुर्ण सदगुरु और कैसी है वह अनमोल पुस्तक जो आपको बिल्कुल निशुल्क: प्राप्त होती है जानने के लिए
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लुटेरा संत

मेरी अर्थिक स्थति काफी दयनीय थी!
बेबसी, लाचारी, मजबुरी और कर्ज की चिंता एक “चीता” की तरह अंदर ही अंदर मुझे जलाये जा रही थी!
“सोने पर सुहागा” था की शारीरिक रोगो के साथ-साथ एक लड़की से साथ जीने-मरने वाला प्यार,और फिर उसी लड़की से एक भारी बिछोड़ मुझे दुखो के दलदल मे डुबो गया!
उदासी और नकारात्मकता मुझे “रोज” आत्महत्या करने के नये नये तरीके सिखाने लगी!
अब तक सारे देवी देवताओ को खुब मना चुका था,लेकिन क्रष्ण,राम,शंकर,जैसे देवता जो खुद अपने जीवनकाल मे इन तकलीफो को भोगने से नही बच सके थे,मेरी मदद भी ना कर सके!
फिर एक दिन किसी ने बताया की संत रामपालजी महाराज की शरण ग्रहण करो,वह
भक्ति की सही विधी देंगे फिर आपके जीवन मे एक भारी बदलाव आयेगा और दुख के बादल हमेशा के लिए छट जायेंगे!
विडंबणा थी की ढोंगी और पाखंडी बाबाओ से मेरा विश्वास उठ चुका था,और किसी भी संत पर भरोषा करना मेरे लिए “राख मे घी डालने जैसा था!
मुझे अपने जीवन के गहरे अनुभव पर पुर्ण विश्वास था! बाबाओ का चेहरा देखकर ताड़ देता था की यह दुराचारी है या व्याभिचारी!
बाबाओ की लंबी जटा और लंबी दाढ़ी मुछ के पीछे छुपी दुष्टता से अच्छी तरह परिचीत था “मै”!
लेकिन कहते है ना की “डुबते को तिनके का सहारा”!
इसी मुहावरे की पुछ पकड़ कर एक बार फिर इत्मिनान करना चाहता था,जहाँ इतने बाबा अजमाये वहा एक और सही!
इसके लिए हरियाणा के बरवाला गांव जाना जरुरी था जँहा संत रामपाल जी महाराज का आश्रम था!
मुश्किल से आने जाने का किराया जुटा कर “मै”चल पड़ा!
आश्रम मे दाखिल हुआ………!
सतसंग स्थल पर चादर फैलाई और थोड़ी देर पाव पसारे!______________फिर उठकर सोचालय की तफतिश मे निकला!
यहा लेट बाँथ से संबंधित जैसे,साबन,तेल, मंजन,अादि सर्व सुविधाए नि:शुल्क थी!______नहा-धोकर फ्रेस हुआ और अपनी जगह(चादर)पर पहुँचा!
भुख से पेट मे चुहे दौड़ने लगे तो भंडार ग्रह की और चला.!
देखा की हजारो की तादाद मे एक व्यवस्थित कतार मे श्रद्धालु भोजन कर रहे है!
अश्चर्य था की यहा पर चौविसो घंटे खाना भी मुफ्त है!
स्टील के पिंजरे सरिखा एक बड़ा ट्राला था, जिससे ग्लास, थाली, चम्मच और कटोरी उठाई और कतार मे बैठकर पेटभर खाना खाया!
यहा जितनी नकारात्मक बाते सोचकर आया था सबकुछ उससे विपरीत ही हो रहा था!
लेकिन मै अभी भी उदास ही था क्योकि मेरी समस्याए तो ज्यो-त्यो बनी हुई थी,और मन मे यह भी ठान रखा था की नाम उपदेश तो लुंगा नही,और अगर नाम दिक्षा लेने के लिए कुछ मन बना भी तो नामदिक्षा मे जितनी फिसँ जँमा करना भी पड़ी तो असमर्थ ही रहुंगा, क्योकि सिर्फ वापस इंदौर जाने का किराया ही शेष था जेब मे!
कुछ देर बाद बाबाजी के दर्शनार्थ कतार मे खड़ा हुआ!
बाबा जी के उपस्थित होते ही जोर जोर से जयकारे लगने लगे, सोचा जिसे इंटरनेशनल संत बताया जा रहा है और तत्वदर्शी जगत् गुरु कहकर संबोधित किया जा रहा है वह दिखने मे वैसा ही होगा जैसा मेरा अनुभव कहता है!
कुछ ही देर मे संत जी मेरे सामने थे, उनकी साधारण वेषभुषा और चेहरा देखकर अश्चर्य से मेरी ऊपर की स्वास ऊपर और निचे की स्वांस निचे ही अटक कर रह गई!
अश्चर्य का वेग इतना तीव्र था की ऐसा लगा मानो एक हजार बिच्छुओ ने मुझे एक साथ डंक मारा हो!
इतना मनोरम चेहरा, जिस पर ना कोई दाढ़ी ना मुछ, और ना कोई लंबी जटा और ना ही किसी प्रकार के भगुवे कपड़े या साधुवेष!
एक सफेद कुर्ते पजामे मे लिपटा संत जी का ऊंचा शरीर मुझे उन पर विश्वास करने को मजबुर कर गया!
मुझे अपने अनुभव पर जो पुरा विश्वास था मेरे विश्वास ने ही मुझे धोका दिया!
मैने नाम उपदेश लिया और सतभक्ति शुरु कर दी!
कुछ ही दिनो मे मेरी जींदगी से दुख कंपुर की तरह उड़ गये, और मेरा जीवन सुखमय हो गया!
आखिर इस लुटेरे संत ने मेरे सारे रोग लुट लिए!
मेरे सारे कष्ट सारी तकलीफे ही लुट ली!
मेरी आर्थिक स्थति सुधरी और कर्ज से मुक्त हुआ!
जिस महिला के प्यार मे हारने के बाद रोज प्रतीदिन आत्महत्या के नये विचार हर पल दिमाग पर हावी रहते थे, उस मोह का नाश करके मेरी सारी तकलीफे लुट ली!
धन्यवाद रुपी एक “वाह” मेरी अंतरात्मा से निकल कर कह गई की उपकार है उन संत रामपालजी महाराज का जिन्होने मेरा सबकुछ लुट लिया!
दुनिया मे धन के लुटेरे देखे, आबरु के लुटेरे देखे, लेकिन दुखो का लुटेरा तो पहली बार ही देखा!
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शेर चाल

उस ग्रेट साइरन की “शैर चाल” ने धर्म के नकली दुकानदारो के चेहरे की हवाईया उड़ा कर रखी थी!
असहाय और दुखी जनता को मिठी-मिठी बातो के साथ प्रासंगिक कथाओ का मक्खन लगाने वाले कथावाचक भी उस महान संत से पीछा छुड़ाने का भरषक प्रयास कर रहे थे!
आखीर ऐसा क्या था इस “ग्रेट साइरन” के पास जिसके डर से वर्तमान के, संत, महंत, और आध्यात्म गुरु, स्वप्न मे भी भय मानने लगे थे__________?
सच्चाई कुछ इस तरह है की इस “ग्रेट साइरन” ने सर्व सदग्रंथो के रहस्य रुपी ग्यान सागर मे गहरी छलांग लगाई,और चारो धर्म जैसे वेद, शास्त्र, बाईबल, गुरुग्रंथ साहेब, कुरान शरिफ, अठारह पुराणो का अनावरत अध्ययन किया और दिन रात के प्रयास से यह पता लगाया की
हम देवी देवताओ की इतनी भक्ति करते है फीर भी जीवन मे सुख नही मिलता, पुर्ण मोक्ष भी नही मिलता, क्योकि अगर पुर्ण मोक्ष मिला होता तो कुत्ता, गधा, सुअर, बैल बनकर आज दुख नही भोगना पड़ता, पशु पक्षीयो की बात तो बहुत दुर, हम मनुष्य जीवन पर ही एक नजर डाले तो पता चलेगा की जानवरो से भी बत्तर जीवन हो चुका है हमारा, आखीर क्यो ?

अगर भगवान है तो कहा है वो दिखाई क्यो नही देता ?

अगर कर्म ही प्रधान है तो फिर बुरे कर्म करने की प्रेरणा कौन करता है जिन्हे भोगकर हम दुख उठाते है ?

लाख कोशिश के बावजुद जीवन से दुख के बादल क्यो नही छटते है ?

लोग कहते है ब्रह्मा विष्णु महेश से बड़ा कोई देवता नही है, और इनके कोई माता पिता नही है,
_________लेकिन जरा सोचो की इस “ग्रेट साइरन” के अथक प्रयास से अब पता चल चुका है की ब्रह्मा विष्णु महेश के माता पिता भी है और इतना ही नही बल्कि इन तीनो की माता और दादाजी भी मौजुद है!

आखिर कौन है यह “ग्रेट साइरन” जिसने इस असंभव रहस्य का पता लगाया! क्या है पुरी सच्चाई ?

तो आईए ले चलते है आपको एक ऐसी जगह जहाँ पर सच्चाई का भंडार है!

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